कृष्ण की बांसुरी: मधुर तान की दिव्य अहमियत

कृष्ण की बांसुरी सिर्फ एक वाद्य यंत्र नहीं, बल्कि आत्मा को छू लेने वाली दिव्य ध्वनि का प्रतीक है। जब भगवान कृष्ण वृंदावन के कान्हन में अपनी बांसुरी बजाते थे, तो उस मधुर राग से न केवल गोपियाँ, बल्कि सभी निवासी मुग्ध हो जाते थे। पशु-पक्षी, वृक्ष, नदियाँ—सब उस तान में ताल देने लगते थे।

उस संगीत की ध्वनि सिर्फ कानों तक ही नहीं, आत्मा तक पहुँच जाती थी। यह आह्वान की तरह थी—एक ऐसी पुकार जिसे सुनते ही हर कोई सब कुछ त्यागकर कृष्ण के पास दौड़ पड़ता। यह पल इतना दिव्य होता था कि वृंदावन का हर निवासी आनंद के उस अनंत सागर में डूब जाता।

लेकिन आज के जमाने में, क्या हम वह संगीत सुन पाते हैं? हाँ, लेकिन शर्त के साथ—अगर हम अपने लगातार रोने, शिकायतों और चिंताओं को थोड़ा सा कम कर दें। जब दिल शांत होता है, तभी तो बांसुरी की तान सुनाई देती है।

आज भी वह राग गूँज रहा है, बस हमारे भीतर के शोर को शांत

यह भी देखें

विस्तृत लेख

संबंधित विषय