रुक्मिणी का अंतिम त्याग
श्रीकृष्ण के स्वर्गवास के बाद द्वारका में एक सन्नाटा छा गया। मौसल पर्व में यदु कुल के विनाश के बाद, जब कृष्ण धरती पर अपना अवतार समाप्त कर लौट गए, तो रुक्मिणी का हृदय टूट गया। उनके लिए कृष्ण सिर्फ एक पति नहीं, बल्कि जीवन का आधार थे।
जब समाचार आया कि कृष्ण का शरीर नहीं मिला, कि वे निजधाम सिधार गए हैं, तो रुक्मिणी ने जीने का कोई अर्थ नहीं पाया। साथ ही, जांबवती और अन्य पत्नियाँ भी इस वियोग में टूट चुकी थीं। रुक्मिणी ने तब निर्णय लिया कि वे कृष्ण के बिना जीवित नहीं रह सकतीं।
प्राचीन परंपरा के अनुसार, वे जांबवती के साथ अंतिम संस्कार स्थल पर पहुँचीं और कृष्ण की स्मृति में अपनी ज्योति समाप्त कर दी। यह कोई सामान्य घटना नहीं थी, बल्कि एक आध्यात्मिक एकता का प्रतीक था — प्रेम और निष्ठा की पराकाष्ठा।
रुक्मिणी का यह अंतिम कदम आज भी भक्तों के हृदय में गहरी छाप छोड़ता है। उनका जीवन और मृत्यु दोनों ही श्रीकृष्ण क
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