सुदामा का सादा भोजन और आश्रम की अनुशासन
सुदामा और श्रीकृष्ण दोनों ही गुरुकुल में एक साथ पढ़ते थे। उस समय छात्रों का जीवन बहुत सादगी भरा होता था। भोजन के लिए वे दोनों मिलकर नगर में भिक्षा मांगने जाते थे।
हर बार भिक्षा लाकर गुरु मां के चरणों में अर्पित करने के बाद ही वे खाना शुरू करते थे।यह आश्रम का नियम था और श्रीकृष्ण हमेशा उसका पालन करते थे। लेकिन सुदामा के साथ अलग ही कहानी थी। वे बचपन से ही गरीब परिवार से थे और अक्सर भूखे रह जाते थे। जब वे भिक्षा लेकर लौटते, तो रास्ते में ही उन्हें इतनी भूख लगती कि वे चुपके से भोजन का आधा हिस्सा खा लेते थे।
श्रीकृष्ण को यह पता था, लेकिन वे कभी उन्हें डांटते नहीं थे।उल्टा, वह मुस्कुरा देते और कहते, "सुदामा, तुम्हारी भूख तो मेरी भी भूख है।" यही प्रेम और सरलता उनकी मित्रता की नींव थी। इस छोटी सी आदत ने न सिर्फ सुदामा की गरीबी दिखाई, बल्कि उनकी सच्चाई भी।
आज भी यह कथा याद की जाती है,
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