रुकमणी का हरण: प्रेम और धृति की अमर गाथा

रुकमणी का हरण भारतीय पौराणिक कथाओं में प्रेम, साहस और भाग्य का एक अनूठा अध्याय है। जब रुकमणी, विदर्भ की राजकुमारी, केवल श्रीकृष्ण से विवाह करने की इच्छा लिए थी, तो उनके परिवार ने उनका विवाह शिशुपाल से तय कर दिया। लेकिन रुकमणी ने मन-ही-मन भगवान कृष्ण को अपना वर मान लिया था।

जिस क्षण वह अपने रथ पर आरूढ़ होने ही वाली थी, श्रीकृष्ण विद्युत की भाँति वहाँ पहुँचे। उन्होंने रुकमणी का हाथ पकड़ा, उन्हें अपने रथ पर बैठा लिया और तुरंत द्वारका की ओर रवाना हो गए। वह घटना इतनी तीव्र थी कि नगर में क्षण भर में ही हलचल मच गई। "कृष्ण ने रुकमणी का हरण कर लिया!" — यह खबर पल भर में कुण्डिनपुर से लेकर द्वारका तक फैल गई।

हालाँकि इसे ‘हरण’ कहा जाता है, लेकिन वास्तव में यह प्रेम की जीत थी। रुकमणी ने स्वयं कृष्ण को चुना था, और उनका साहसिक आगमन उस प्रेम की सच्चाई को दर्शाता है। इस घटना के बाद विवाह समारोह द्वारका में

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