कृष्ण की बांसुरी का अंतिम स्वर

भगवान कृष्ण की बांसुरी केवल एक वाद्य नहीं, बल्कि उनके प्रेम, माधुर्य और आत्मा की अभिव्यक्ति थी। वृंदावन की हर सुबह और शाम उनकी बांसुरी की तान से गूंज उठती थी। लेकिन एक दिन, जब यह ज्ञात हुआ कि कृष्ण मथुरा जाने वाले हैं, तो वृंदावन का वातावरण गहरे दर्द से भर उठा।

अपने जीवन के सबसे कठिन पलों में, कृष्ण ने आखिरी बार राधा से मिलने के लिए बरसाती घाट पर प्रतीक्षा की। यह मिलन मौन था, लेकिन आँखों में आँसू और दिल में विछोड़े का दर्द था। उसी घड़ी, जब अलगाव की त्रासदी अपने चरम पर थी, कृष्ण ने अपनी प्रिय बांसुरी को अपने हाथों में तोड़ दिया।

बांसुरी तोड़ना केवल एक क्रिया नहीं थी, बल्कि वृंदावन से विदाई का प्रतीक था। वह बांसुरी, जो कभी ग्वालियों को मोह लेती थी, अब चुप हो गई। यह कृष्ण का विरह था, प्रेम की अंतिम अर्पण।

वृंदावन के वन, यमुना का किनारा और पेड़ों की छाल आज भी उस टूटी हुई बांसुरी की गूंज

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