श्री कृष्ण और उनकी प्रिय बांसुरी
भगवान श्री कृष्ण के साथ बांसुरी का गहरा संबंध है। उनकी मधुर बांसुरी की धुन सिर्फ गोकुल के मैदानों तक ही सीमित नहीं थी, बल्कि वह मनुष्यों के मन को भी आकर्षित करती थी। इस बांसुरी को विभिन्न नामों से जाना जाता है — वंसी, वेणु, वंशिका और मुरली। ये नाम उसकी सरलता और आध्यात्मिक गहराई को दर्शाते हैं।
कृष्ण को अनेक वाद्ययंत्र प्रिय थे — ढोल, मृदंग, झांझ, मंजीरा, नगाड़ा, पखावज और एकतारा। लेकिन उन सबके बीच बांस से बनी यह सादी सी बांसुरी सबसे विशेष स्थान रखती है। कहते हैं, इसकी धुन सुनकर गोपियाँ अपने घर-परिवार छोड़कर वृंदावन की ओर खिंची चली आती थीं। यह केवल एक वाद्य नहीं, बल्कि प्रेम और आकर्षण का प्रतीक है।
आज भी मंदिरों और कीर्तनों में बांसुरी की धुन सुनाई देती है, तो लगता है मानो कृष्ण फिर से बजा रहे हैं। उनकी वंशिका ने न सिर्फ ग्वालों और गोपियों के हृदय जीते, बल्कि हर युग के लोगों के मन में एक
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