भारत में बांसुरी: एक शास्त्रीय यात्रा

बांसुरी को लाखों वर्षों से भारतीय संस्कृति में संगीत का अहम हिस्सा माना जाता है। हालांकि, यह मूल रूप से ग्रामीण लोक संगीत में प्रयुक्त होने वाला साधारण वाद्य था। इसका शास्त्रीय संगीत में प्रवेश किसी एक व्यक्ति के प्रयास से संभव हुआ – प्रसिद्ध बांसुरी वादक पन्नालाल घोष

उन्होंने 20वीं सदी में एक छोटे लोक वाद्य को एक पूर्ण शास्त्रीय यंत्र में बदल दिया। पहले बांसुरी छोटी और सीमित स्वर क्षमता वाली होती थी, लेकिन पन्नालाल घोष ने इसे 32 इंच लंबी, सात अंगुलियों के छेद वाली बांस की बांसुरी में विकसित किया। यह नया रूप भारतीय शास्त्रीय संगीत की जटिलताओं को समेटने में सक्षम था।

पन्नालाल घोष ने न केवल वाद्य को तकनीकी रूप दिया, बल्कि इसे मंचों पर भी स्थापित किया। उनके कारण बांसुरी आज शास्त्रीय संगीत समारोहों का अनिवार्य हिस्सा बन गई है। उनके प्रयासों ने अगली पीढ़ियों के लिए रास्ता साफ किया, जिसमें हरिप्रसाद चौर

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