खुदीराम बोस: भारत के पहले फांसी पर चढ़े क्रांतिकारी

भारत की स्वतंत्रता की लड़ाई में खुदीराम बोस एक प्रेरणास्थली हैं। केवल 18 साल की उम्र में, उन्होंने देश के लिए अपनी जान की बाजी लगा दी। वे ब्रिटिश शासन के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष में शामिल होने वाले पहले युवाओं में से एक थे।

8 जून, 1908 को उन्हें अदालत में पेश किया गया, जहाँ केवल पांच दिन की सुनवाई के बाद, 13 जून, 1908 को उन्हें मौत की सजा सुना दी गई। कहा जाता है कि जब उन्हें फांसी की सजा सुनाई गई, तो उनके चेहरे पर एक पल के लिए भी डर या दुख नहीं दिखा। उनकी दृढ़ता ने उस समय के लाखों भारतीयों के दिल में जगह बना ली।

11 अगस्त, 1908 को मोंगेर जेल में खुदीराम बोस को फांसी पर चढ़ा दिया गया। इस तरह, वे स्वतंत्रता संग्राम में सर्वप्रथम फांसी देने वाले क्रांतिकारी बने। उनकी बहादुरी और बलिदान ने आगे आने वाले क्रांतिकारियों को प्रेरणा दी।

आज भी उनका नाम उस युवा ऊर्जा के रूप में याद किया जाता

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