दीपक राग: आवाज़ से जलते दीपक
भारतीय संगीत के रहस्यमय रागों में दीपक राग एक अनोखा स्थान रखता है। मान्यता है कि यह राग इतना तापमय होता है कि इसे गाते ही आसपास की वस्तुओं में आग लग सकती है। लेकिन कहानियों के अनुसार, इस राग को सुरक्षित रूप से केवल दीपावली की रात में गाया जा सकता था।
दीपावली के दूसरे पहर में, जब घर-घर में दीये जलते हैं, तब गायक दीपक राग गाते। कहा जाता है कि राग द्वारा उत्पन्न ऊष्मा दीयों की लौ में समा जाती थी, और इस तरह न तो गायक को नुकसान होता, न ही कोई आगजनी होती। यह एक अद्भुत सामंजस्य था — संगीत और उत्सव की आत्मा का मिलन।
पुराणों में कहा गया है कि दीपक राग की उत्पत्ति भगवान शिव के मुख से हुई। उनके ताप और तेज को ध्वनि के माध्यम से जारी करने का यह एक रूप माना जाता है।
आज यह राग शायद बहुत कम सुनाई देता है, लेकिन इसकी कहानी आज भी संगीत के दिल में एक जीवंत लौ की तरह जलती है।
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