अनंदा की पाठशाला: एक सरल याद
बचपन की छोटी-छोटी बातें कई बार जीवन के सबसे खूबसूरत पल बन जाती हैं। लेखक आनंदा के अनुभवों को देखकर यह बात साफ झलकती है। उनकी आत्मकथा 'जूझ' में वह अपने बचपन के संघर्षों को बहुत सरल और मार्मिक तरीके से सुनाते हैं, जिनमें पढ़ाई की ललक भी शामिल है।
उनकी पाठशाला ग्यारह बजे लगती थी। यह समय आज के जमाने के मुकाबले थोड़ा अलग लगे, लेकिन उस दौर में यह सामान्य था। स्कूल जाने के रास्ते में भी कई बार खेतों से होकर गुजरना पड़ता था, और कई बार पैरों में चोटें आती थीं। फिर भी पढ़ने की तमन्ना इतनी मजबूत थी कि हर मुश्किल को पीछे छोड़ दिया जाता।
आनंदा के लिए पढ़ाई सिर्फ एक जरूरत नहीं, बल्कि एक संघर्ष था। लेखक ने इस आत्मकथा के माध्यम से यह दिखाया कि कैसे गरीबी और परिस्थितियाँ भी एक बच्चे के सपनों को नहीं रोक सकतीं। आज भी ऐसे कई बच्चे हैं जो घर से दूर-दूर तक स्कूल जाते हैं, लेकिन उनके चेहरे पर पढ़ने की चमक बनी
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