गीता के अनुसार ब्राह्मण कौन है?
भगवद गीता में श्री कृष्ण ने ब्राह्मण की परिभाषा गुणों और कर्म के आधार पर दी है, न कि जन्म या परिवार के आधार पर। गीता के अनुसार, जो व्यक्ति शम (मन का निग्रह), दम (इंद्रियों का संयम), सत्य, करुणा, प्रेम, शील और निस्पृहता जैसे गुणों का स्वामी होता है, वही वास्तविक ब्राह्मण है।
श्री कृष्ण स्पष्ट करते हैं कि “चातुर्वर्ण्य मया सृज्तं गुणकर्मणा विभागशः” (गीता 4.13) — चार वर्ण मैंने गुण और कर्म के आधार पर बांटे हैं। इसका अर्थ स्पष्ट है — ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र बनाने वाला जन्म नहीं, बल्कि गुण और कर्म है।
आज कई लोग जन्म से ब्राह्मण होने का दावा करते हैं, लेकिन गीता के अनुसार वास्तविक ब्राह्मण वही है जो आचरण में पवित्र, मन में शांत, इंद्रियों पर नियंत्रण रखने वाला और लोभ से परे हो। ऐसा व्यक्ति स्वभाव से ही ज्ञान की ओर झुकता है, धर्म का पालन करता है और सभी प्राणियों के प्रति दया रखता है।
इस प्रकार, गीता म
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