कोहिनूर हीरा: एक विवादित विरासत
कोहिनूर हीरे का इतिहास उतना ही चमकदार है जितना रहस्यमय। यह हीरा कई शासकों के सिर के ताज की शान बढ़ा चुका है। लेकिन आखिरकार यह अंग्रेजों के पास कैसे पहुंचा? 1849 में द्वितीय आंग्ल-सिख युद्ध के बाद, पंजाब के अंतिम महाराजा दलीप सिंह ने लाहौर की संधि के तहत ब्रिटिश गवर्नर-जनरल लॉर्ड डलहौजी को कोहिनूर हीरा सौंप दिया। यह घटना एक विजय के प्रतीक के रूप में हुई, लेकिन कई लोगों के लिए यह एक दुखद क्षण था।
कुछ कथाओं के अनुसार, महाराजा रणजीत सिंह के बाद इस हीरे को जगन्नाथ मंदिर, पुरी में ब्राह्मणों को समर्पित किया जाने वाला था। हालांकि, ऐतिहासिक रिपोर्ट्स, जैसे कि क्लाउड मार्टिन वेड की, इस बात की पुष्टि करती हैं कि हीरे को अंततः ब्रिटिश शासन को हस्तांतरित कर दिया गया।
आज, कोहिनूर ब्रिटिश ताज का हिस्सा है, लेकिन भारत, पाकिस्तान और अन्य देश इसकी वापसी की मांग करते रहे हैं। यह हीरा सिर्फ एक आभूषण नहीं, बल्कि एक साम
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