भारत माता: एक भावना, एक संकल्प
जब भी 'भारत माता' का नाम लिया जाता है, तो मन में एक ऐसी माँ की छवि उभरती है, जो अपनी धरती पर बसने वालों को प्रेम, शांति और आशा का पालन करती है। यह विचार सिर्फ एक नारा नहीं, बल्कि एक गहरी भावना है, जो सदियों से भारतीय संस्कृति में बसी हुई है।
इस शब्द को साहित्य में पहली बार किरण चन्द्र बन्दोपाध्याय के एक नाटक में सन् 1873 में जगह मिली थी। उस समय भारत अंग्रेजों के शासन में था और लोग आजादी के लिए संघर्ष कर रहे थे। ऐसे में भारत को माँ के रूप में देखना प्राकृतिक था। जैसे माँ की रक्षा के लिए बच्चे तैयार होते हैं, वैसे ही स्वतंत्रता सेनानियों ने भी भारत माता की आजादी के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर कर दिया।
भारत माता क्या करती है?वह न सिर्फ अनाज उगाती है, नदियाँ बहाती हैं, बल्कि लाखों लोगों के सपनों को भी पालती है। वह हमें एकता, साहस और सम्मान का पाठ पढ़ाती है। आज भी जब कोई 'भारत माता की जय' कहता है, तो वह सिर्फ एक ध्वनि
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