लेखक का मामा के घर का समय
लेखक अपने बचपन में हर साल गाँव आता था, और वह अपने मामा के घर ठहरता था। यह वक्त उसके लिए बहुत खास होता था। वहाँ न तो स्कूल की जल्दबाज़ी होती थी, न ही किताबों का बोझ। बल्कि, आम के पेड़, खुले आँगन, और मामी की स्वादिष्ट रोटियाँ उसके दिन भर का आनंद बन जाती थीं।
हालाँकि, इस मस्ती का भी एक अंत होता था। लेखक स्कूल खुलने तक ही मामा के घर रह पाता था। आमतौर पर यह वक्त एक आध-महीने तक का होता था। जैसे ही स्कूल के दरवाज़े फिर से खुलने का समय नज़दीक आता, उसे वापस शहर लौटना पड़ता था।
उस छोटी सी अवधि में भी लेखक ने खूब यादें बनाई थीं। मामा के घर की छत पर चाय के साथ बैठे पिताजी की कहानियाँ, चचेरे भाई के साथ तालाब के किनारे गुब्बारे बनाना, और गाँव की सुबह की ठंडी हवा — सब कुछ उसके दिल में बस गया था।
आज भी जब वह उन पलों को याद करता है, तो लगता है जैसे वे दिन बस कल के हों। शायद इसीलिए वह अपने बच्चों को भ
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