गांधी जी का प्रिय भजन: 'वैष्णव जन तो तेने कहिए'
महात्मा गांधी के जीवन में धार्मिक भजनों का विशेष स्थान था। उनके लिए आध्यात्मिकता सिर्फ अनुष्ठान नहीं, बल्कि जीने का तरीका थी। ऐसे में एक भजन जो हमेशा उनके साथ रहा, वह था – 'वैष्णव जन तो तेने कहिए'। यह भजन 15वीं शताब्दी के गुजराती संत कवि नरसी मेहता द्वारा रचित है और गुजरात से लेकर पूरे भारत में अत्यंत प्रिय है।
गांधी जी इस भजन को इसलिए भी प्यार करते थे क्योंकि इसकी पंक्तियां उनके विचारों – सत्य, अहिंसा, सेवा और समानता – से पूरी तरह जुड़ी हैं। इसमें कहा गया है – "पीर पराई जाणे रे", यानी दूसरों की पीड़ा को अपनी पीड़ा समझना। फिर "सकल लोक मा सहुने बंदे" – सभी के लिए समान भाव रखने वाला व्यक्ति ही वैष्णव जन है।
इसके अलावा, "परस्त्री जेणे मात रे" – जो दूसरी स्त्री को माता की तरह देखे, वही सच्चा भक्त है। गांधी जी इस भजन को अपने आश्रमों में गाया करते थे। यहां तक कि दां
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