भारत की आजादी के महान नायक
भार को आजाद कराने में किसका हाथ था? यह सवाल पूछा जाए, तो इसका जवाब सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि हजारों नामों की गूंज है। आजादी की लड़ाई सिर्फ एक व्यक्ति या पार्टी की नहीं थी, बल्कि लाखों अज्ञात शहीदों, क्रांतिकारियों और स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान का नतीजा थी।
नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने 'देश के लिए मरना, लेकिन गुलामी स्वीकार न करना' का संदेश दिया। उन्होंने आजाद हिंद फौज का गठन कर ब्रिटिश शासन को सीधे चुनौती दी। उनका नारा "तुम्हीं शहीदों की शहादत को धन्य है" आज भी दिल छू जाता है।चंद्रशेखर आज़ाद ने अपने हथियार और सिद्धांतों को कभी नहीं छोड़ा। "हर भारतीय की मौत तब तक अधूरी है जब तक आखिरी अंग्रेज भारत न छोड़ दे," यह कहकर वे एक क्रांति के प्रतीक बन गए।
और फिर थे भगत सिंह, जिन्होंने बम फेंककर नहीं, बल्कि अपने विचारों से देश को जगाया। "मैं क्रांति का पुजारी हूँ," कहकर वे फाँसी के फंदे पर झूल गए।
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