गांधी जी की पैदल यात्रा: एक साहसिक प्रतिबद्धता

महात्मा गांधी ने दक्षिण अफ्रीका में रहते हुए न केवल अहिंसा और सत्याग्रह के सिद्धांतों को आँचल में बांधा, बल्कि अपने शरीर से भी उनका परिचय कराय । उनकी छोटी-छोटी आदतों में छिपा था संघर्ष और सेवा का विशाल इतिहास।

बोअर युद्ध के दौरान उन्होंने एक स्वयंसेवक के रूप में घायलों की सेवा की। कई बार वे घायलों को स्ट्रेचर पर लादकर एक दिन में पच्चीस मील तक चले। यह केवल दूरी नहीं थी, बल्कि एक निडर इंसान की दृढ़ता का प्रतीक थी।

उनका जीवन टॉलस्टॉय बाड़ी में सरलता से भरा था। वहाँ के निकट के शहर जाने के लिए अक्सर गांधी जी बयालीस मील की पैदल यात्रा करते थे। भोजन के लिए लेन-देन हो या किसी बैठक में भाग लेना हो — वे कभी भी अपने शरीर को आलस्य की जंजीर में नहीं जकड़ने देते थे।

ये यात्राएँ केवल शारीरिक नहीं, आत्मिक प्रशिक्षण थीं। पैरों के नीचे पड़ती मिट्टी, धूप और थकावट — सब उनके लिए धैर्य

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