बुद्ध के अनात्मवाद की समझ
क्या बुद्ध आत्मा को मानते थे? यह सवाल बहुतों के मन में आता है। लेकिन बुद्ध का दृष्टिकोण पारंपरिक धार्मिक विश्वासों से काफी अलग था। वे न तो 'आत्मा' मानते थे और न ही 'परमात्मा' की अवधारणा को स्वीकार करते थे।
उनका मानना था कि न कोई जीवन देनेवाला है, न ही कोई आत्मा जो शरीर से अलग अस्तित्व में हो। बल्कि, जो हम जीवन समझते हैं, वह कर्म का परिणाम है। प्रत्येक प्राणी अपने कर्मों के आधार पर भवचक्र में जन्म लेता और मरता है। मोक्ष की ओर रास्ता तभी खुलता है जब तृष्णा का पूर्ण निरोध हो जाए।
इस दृष्टिकोण को अनात्मवाद कहा जाता है — आत्मा के अभाव में विश्वास। बुद्ध के लिए, आत्मा एक भ्रम था, जो पीड़ा का कारण बनता है। जब तक व्यक्ति यह भ्रम त्याग नहीं करता, वह जन्म-मरण के चक्र से मुक्त नहीं हो सकता।
इसलिए बुद्ध का संदेश था — आत्मा की तलाश करने के बजाय, तृष्णा और अज्ञान को समझो। जब चित्त शुद्ध होगा, तब सच्चा ज्ञान उदित होगा। औ
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