बुद्ध और ब्राह्मणवाद: एक धार्मिक समझौता
बौद्ध धर्म ने भारत में एक ऐसी क्रांति ला दी थी, जिसने सदियों पुरानी जाति प्रथा और यज्ञ-पूजा पर सीधे सवाल उठाए। ब्राह्मणवादी व्यवस्था के लिए बुद्ध का प्रभाव खतरनाक था—एक ऐसा संत, जो वेदों को अंधविश्वास बताता था, जाति को नकारता था और सभी के लिए मुक्ति का द्वार खोलता था।
लेकिन ब्राह्मण वर्ग ने बुद्ध को खत्म नहीं किया, बल्कि उन्हें अपने धर्म में समाहित कर लिया। उन्होंने बुद्ध को विष्णु का नौवाँ अवतार घोषित कर दिया। इस तरह, एक चुनौती को निगल लिया गया। बुद्ध अब कोई विद्रोही नहीं, बल्कि हिंदू धर्म का ही हिस्सा बन गए।
यह समायोजन बौद्धों के लिए दर्दनाक था। जिस बुद्ध ने पूजा, मूर्ति, जाति और अधिकारों के खिलाफ आवाज उठाई, उन्हीं को अब एक देवता का रूप दे दिया गया। धर्म को जब संस्थागत शक्ति से चुनौती मिलती है, तो संस्था उसे नष्ट करने के बजाय अपने ढांचे में बांध लेती है।
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