सृष्टि का निर्माता कौन है?

यह प्रश्न जितना प्राचीन है, उतना ही गहरा भी है — सृष्टि को कौन चलाता है? दसवीं शताब्दी के महान भारतीय दार्शनिक उद्योतकर, जिन्हें उद्यन भी कहा जाता है, ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ न्यायकुसुमांजलि में इसी प्रश्न पर गहन विचार किया। उनका मानना था कि जिस तरह एक मकान, एक पुस्तक या कोई भी वस्तु अपनी रचना और विकास के लिए किसी बुद्धिमान व्यक्ति पर निर्भर करती है, उसी तरह सारी सृष्टि — पृथ्वी, आकाश, जीव-जंतु, नदियाँ, पहाड़ — एक विशाल रचना की तरह है, जिसका निर्माण और संचालन किसी उच्च बुद्धि के बिना संभव नहीं।

उद्यन के अनुसार, प्रकृति में दिखने वाली व्यवस्था, नियमितता और सुसंगतता स्वयं कहती है कि यह सब अनियंत्रित यादृच्छिकता नहीं है। सूर्य नियमित समय पर उगता है, मौसम चक्र बने रहते हैं, जीवन के सभी रूप एक क्रम में विकसित होते हैं — यह सब किसी सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान और चेतन सत्ता की ओर इशारा करता है।

आज भी, विज्ञान क

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