माता कुंती की अंतिम यात्रा
माता कुंती, जो पांडु की पत्नी और युधिष्ठिर, भीम और अर्जुन की जननी थीं, का अंतिम समय हर किसी के दिल को छू जाता है। कुरुक्षेत्र के भयंकर युद्ध के बाद जब राजधर्म और शोक दोनों के बीच धैर्य की आवश्यकता थी, तब कुंती ने अपने पुत्रों को छोड़कर एक तपस्वी जीवन का मार्ग अपनाया।
वे व्यासजी के आश्रम में धृतराष्ट्र और गांधारी के साथ रहने लगीं। समय बीतता गया और एक दिन, जब वे गंगा में स्नान कर लौट रही थीं, तभी वन में अचानक भयंकर आग लग गई। उम्र के कारण कमजोर हो चुके धृतराष्ट्र, गांधारी और कुंती के लिए भागना असंभव था।
लेकिन महाभारत की यह महान आत्माएं डरने वाली नहीं थीं। उन्होंने आग के सामने आँखें बंद कर लीं और शांत भाव से ध्यान में बैठकर इस जगत को छोड़ दिया। वे न तो जले, बल्कि अपनी इच्छा से ब्रह्म की ओर उठ खड़े हुए।
इस तरह, तीनों ने एक साथ ही आग में प्रवेश कर मोक्ष की ओर प्रस्थान किया। कुंती की म
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