गांधीजी के तीन बंदर: एक प्रेरणादायक प्रतीक
गांधीजी के तीन बंदर सिर्फ एक नारे या मूर्ति का संग्रह नहीं थे, बल्कि एक गहरे संदेश का प्रतीक थे। ये तीन बंदर चीनी मिट्टी (सिरेमिक) के बने हुए थे और उन्हें उनके जीवन में एक जापानी भिक्खु ने भेंट किया था। यह उपहार 1930 के दशक में दिया गया था, जब गांधीजी की शांति और अहिंसा की विचारधारा दुनिया भर में प्रसिद्ध हो रही थी।
देख मत, बोल मत, सुन मत—यह जापानी संकल्पना 'मिमाता, किकाता, इवाता' से ली गई है। गांधीजी ने इन बंदरों को नैतिक आचरण का प्रतीक माना। उनका मानना था कि बुराई से बचने के लिए अक्सर देखने, सुनने और बोलने से परहेज करना जरूरी होता है। ये बंदर उनके आश्रम के एक कोने में रखे गए थे और आज भी साबरमती आश्रम परिसर में संग्रहालय में सुरक्षित रखे गए हैं।
इन छोटी सी मूर्तियों के पीछे एक बड़ा संदेश छिपा है—आत्म-संयम, विवेक और नैतिक दृढ़ता। गांधीजी ने इन्हें न केवल एक कलाकृति के रूप में स्वीकार किया,
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