गांधीजी की शिक्षा विधि: श्रवण, मनन और निदिध्यासन
महात्मा गांधी ने शिक्षा को केवल पढ़ाई तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे जीवन का अहम हिस्सा माना। उनके अनुसार, सच्ची शिक्षा वह है जो शरीर, मन और आत्मा के विकास में मदद करे। इसके लिए उन्होंने श्रवण-मनन-निदिध्यासन को सर्वोत्तम विधि बताया।
इस विधि की शुरुआत श्रवण से होती है—बच्चा पहले सुनता है। यह सुनना सिर्फ कानों से नहीं, बल्कि पूरे ध्यान से होता है। फिर आता है मनन का चरण—सुनी गई बात के बारे में गहराई से सोचना, उसे मन में उतारना, उसके अर्थ को समझना। यह चरण बच्चे के चिंतन और विश्लेषण की क्षमता को निखारता है।
अंत में आता है निदिध्यासन—अर्थात क्रिया में बदलना। सोची-समझी बात को जीवन में लागू करना। गांधीजी का मानना था कि जब तक कोई बात व्यवहार में न बदले, तब तक उसका सच्चा ज्ञान नहीं होता।
यह विधि सिर्फ बच्चों तक ही सीमित नहीं है। वयस्क भी इसका उपयोग करके अपने विचारों को स
टिप्पणियाँ
अभी तक कोई टिप्पणी नहीं। सबसे पहले प्रतिक्रिया दें।