गीता के अनुसार मृत्यु: अंत नहीं, संक्रमण है

भगवद्गीता के अनुसार, मृत्यु कोई अंत नहीं, बल्कि आत्मा के यात्रा का एक हिस्सा है। जैसे कोई व्यक्ति पुराने, फटे कपड़ों को त्यागकर नए साफ-सुथरे कपड़े धारण करता है, वैसे ही आत्मा भी जीर्ण-शीर्ण शरीर को छोड़कर नया शरीर धारण कर लेती है। शरीर मरणशील है, पर आत्मा अमर है। इसलिए मृत्यु को डरावना अंत न समझकर एक स्वाभाविक संक्रमण के रूप में देखना चाहिए।

गीता में श्रीकृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि आत्मा न जन्म लेती है और न मरती है। वह शाश्वत है। मृत्यु तो केवल शरीर का अंत है, आत्मा कभी नहीं मरती। वेद भी इस बात को स्पष्ट करते हैं कि मृत्यु तो स्वाभाविक है, लेकिन मृत्यु पर विजय संभव है — जब हम भौतिक डर और मोह छोड़कर आत्मज्ञान प्राप्त कर लेते हैं।

मृत्यु के डर से मुक्ति तभी होती है जब व्यक्ति यह जान लेता है कि वह शरीर नहीं, बल्कि आत्मा है। यही ज्ञान मृत्यु पर विजय की कुंजी है। गीता कहत

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