धनी की सूझबूझ

“कोई बात ज़रूर है बिन्नी!” — ये शब्द धनी के मुँह से निकले, जब वह एक सुबह बकरी बिन्नी को हरी घास खिला रहा था। धीरे से घास डालते हुए, फिर बर्तन में पानी भरते हुए उसने ये बात कही। लेकिन ये कोई आम बात नहीं थी।

धनी के दिमाग में कुछ घूम रहा था। वह देख रहा था — गांधी जी के कमरे में लोग आए, बैठे, लंबी चर्चा की। धीमी आवाज़ में बातें हुईं, कागज़ों के पुलिंदे फैले। धनी सब कुछ देख तो नहीं पा रहा था, लेकिन उसकी आदत थी — चुपचाप देखना, सुनना और समझ लेना।

“वे सब बैठकर योजना बना रहे हैं,” वह बिन्नी से बोला, मानो बकरी उसकी बात समझ सकती थी। “मैं सब समझता हूँ,” उसने धीरे से कहा, जैसे कोई राज़ खुद को समझा रहा हो।

क्या धनी सच में कुछ जानता था? या बस अपने छोटे से दुनिया में घट रही घटनाओं को अपने तरीके से पढ़ रहा था? शायद दोनों। क्योंकि कभी-कभी वो छोटे-छोटे निरीक्षण ही बड़े रहस्यों को छू लेते हैं। और धनी की आँखों के सामने

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