बाल गंगाधर तिलक के अनुसार राष्ट्रवाद क्या है?
बाल गंगाधर तिलक, भारत के स्वतंत्रता संग्राम के महान सेनानी और चिंतक, राष्ट्रवाद को एक आध्यात्मिक और नैतिक बल मानते थे। उनके लिए राष्ट्रवाद सिर्फ राजनीतिक आंदोलन नहीं, बल्कि जनता के हृदय में देश के प्रति प्रेम, समर्पण और बलिदान की भावना का संगम था।
तिलक का मानना था कि सच्चा राष्ट्रवाद तभी संभव है जब लोग अपनी संस्कृति, इतिहास और मूल्यों से गहराई से जुड़े हों। वे चाहते थे कि भारतीय अपनी परंपराओं पर गर्व करें और उसी के आधार पर एक स्वाभिमानी राष्ट्र का निर्माण करें। उन्होंने “स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है” के नारे से लाखों लोगों के दिलों में आजादी की आग जलाई।
उनके लिए, राष्ट्रवाद का मतलब सिर्फ अंग्रेजों के खिलाफ लड़ना नहीं था, बल्कि भारतीयों में आत्मविश्वास, एकता और सामूहिक जागृति पैदा करना भी था। वे जनता को शिक्षित करने, सामाजिक रूढ़ियों से मुक्ति दिलाने और राष्ट्रीय चेतना जगाने पर
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