अंग्रेजों से पहले का भारत: सम्राटों और राजवंशों का सुनहरी दौर

अक्सर यह सवाल पूछा जाता है कि अंग्रेजों के आने से पहले भारत पर किसका शासन था? इसका कोई एक सीधा जवाब नहीं है, क्योंकि भारत कभी भी एक अकेला राज्य नहीं था, बल्कि यह शक्तिशाली राजवंशों और महान राजाओं की एक सांस्कृतिक भूमि रहा है। इतिहास के अलग-अलग दौर में कई महान घरानों ने इस देश के अलग-अलग हिस्सों को समृद्ध बनाया।

प्राचीन काल में पश्चिमी क्षत्रप और सम्राट हर्षवर्धन का हर्ष वंश काफी प्रभावशाली रहे। वहीं दक्षिण और मध्य भारत में राष्ट्रकूट वंश, परमार राजवंश और कला प्रेमी होसला वंश ने अपनी स्थापत्य कला और सैन्य शक्ति का परचम लहराया। पूर्व में बिहार और बंगाल के क्षेत्र में पाल राजवंश का दबदबा था, जिसने बौद्ध धर्म और शिक्षा को बढ़ावा दिया। इसके अलावा ओडिशा में पूर्वी गंगा शासकों और आंध्र क्षेत्र में काकातिया वंश का मजबूत शासन रहा।

पूर्वोत्तर भारत का इतिहास भी बेहद गौरवशाली रहा है। असम में सूती वंश और विशेष रूप से अहोम वंश ने सदियों तक राज किया। अहोम राजाओं की बहादुरी का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने कई बड़े विदेशी आक्रमणों को नाकाम किया और लगभग 600 सालों तक अपनी स्वतंत्रता बनाए रखी।

इसके साथ ही उत्तर-पश्चिम की सीमाओं पर काबुल शाही वंश और मध्य भारत में कलचुरस वंश जैसे शासकों ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। संक्षेप में कहें तो, अंग्रेजों के भारत आने से बहुत पहले, यह देश अनगिनत राजाओं, विविध संस्कृतियों और समृद्ध साम्राज्यों का एक ऐसा संगम था जिसने दुनिया में अपनी एक अलग पहचान बनाई थी।

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