बटुक भैरव और काल भैरव को मदिरा का भोग क्यों लगाया जाता है?
सनातन धर्म में भगवान शिव के रुद्र अवतार काल भैरव और बटुक भैरव को मदिरा (शराब) का भोग लगाने की परंपरा बहुत पुरानी और प्रसिद्ध है। विशेषकर उज्जैन के प्रसिद्ध काल भैरव मंदिर में भगवान को शराब अर्पित की जाती है और मूर्ति स्वयं मदिरा का पान करती है। इसके पीछे कई पौराणिक, तांत्रिक और आध्यात्मिक कारण हैं:
1. तांत्रिक साधना और अघोर परंपरा
भैरव बाबा को तंत्र साधना के प्रमुख देवता (अधिष्ठाता) माना जाता है। तांत्रिक और अघोर परंपराओं में पंचमकार (मदिरा, मांस, मत्स्य, मुद्रा और मैथुन) का विशेष महत्व होता है। भगवान भैरव तमोगुण और संहार के देवता हैं, इसलिए उन्हें ऐसे भोग अर्पित किए जाते हैं जो आम देवताओं को नहीं चढ़ाए जाते। यह साधना का एक विशिष्ट मार्ग है जो माया और अहंकार से परे ले जाता है।
2. पौराणिक मान्यता और काल भैरव का स्वरूप
पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब भगवान शिव ने क्रोध में आकर ब्रह्मा जी के पांचवें सिर को काट दिया था, तब ब्रह्महत्या का पाप शिव जी के पीछे पड़ गया था। इस पाप से मुक्ति पाने के लिए शिव जी के अंश से उत्पन्न काल भैरव ने उज्जैन के क्षेत्र में शरण ली थी। उग्र और क्रोधी स्वभाव वाले इस स्वरूप को शांत रखने या प्रसन्न करने के लिए तामसिक भोग और मदिरा अर्पित की परंपरा शुरू हुई।
3. प्रतीकवाद और अहंकार का त्याग
आध्यात्मिक दृष्टिकोण से, मदिरा को 'मद' (घमंड, अहंकार और मोह) का प्रतीक माना जाता है। भक्त जब भगवान भैरव को मदिरा अर्पित करते हैं, तो इसका प्रतीकात्मक अर्थ यह होता है कि वे अपने भीतर के सारे अहंकार, वासनाओं और विकारों को भगवान के चरणों में समर्पित कर रहे हैं।
---
क्या इस प्रसाद का सेवन करना चाहिए?
मंदिरों में चढ़ाए गए इस भोग को प्रसाद के रूप में ग्रहण करने की परंपरा स्थानीय मान्यताओं और भक्तों की व्यक्तिगत आस्था पर निर्भर करती है। तांत्रिक परंपरा के साधक इसे प्रसाद के रूप में स्वीकार करते हैं, जबकि सामान्य श्रद्धालु इसे केवल देवता को समर्पित भोग के रूप में ही देखते हैं।
टिप्पणियाँ
अभी तक कोई टिप्पणी नहीं। सबसे पहले प्रतिक्रिया दें।