भारतीय संगीत में कोमल और तीव्र स्वर का महत्व
भारतीय शास्त्रीय संगीत में सात मुख्य स्वर (सा, रे, ग, म, प, ध, नि) होते हैं, जिन्हें शुद्ध स्वर माना जाता है। लेकिन संगीत को अधिक मधुर और भावपूर्ण बनाने के लिए इन स्वरों में कुछ बदलाव किए जाते हैं। जब किसी स्वर की नियमित या प्राकृतिक आवाज़ को थोड़ा नीचे उतारा जाता है, तो उसे कोमल स्वर कहा जाता है।
इसके विपरीत, जब कोई स्वर अपनी नियमित आवाज़ से थोड़ा ऊँचा गाया या बजाया जाता है, तो वह तीव्र स्वर कहलाता है। सात स्वरों में से केवल रे, ग, ध, और नि ऐसे चार स्वर हैं जो अपनी जगह से नीचे हटकर 'कोमल' रूप धारण कर सकते हैं। जब इन चारों स्वरों को वापस उनके नियत स्थान पर गाया जाता है, तो वे फिर से शुद्ध स्वर बन जाते हैं।
संगीत रचनाओं में इन विकृत स्वरों (कोमल और तीव्र) का प्रयोग विभिन्न रागों को एक विशिष्ट पहचान और भावना प्रदान करता है।
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