भगवान शिव का हरा स्वरूप और उनका गहरा अर्थ

सनातन धर्म में देवताओं के विभिन्न रंग और रूप किसी न किसी गहरे आध्यात्मिक संदेश को दर्शाते हैं। आमतौर पर भगवान शिव को कर्पूरगौरम् यानी कपूर के समान सफेद या भस्म लपेटे हुए दिखाया जाता है, लेकिन कुछ विशेष रूपों और कथाओं में उन्हें हरे रंग में भी देखा और पूजा जाता है। उन्हें 'हरे भगवान' के रूप में देखना प्रकृति और जीवन के प्रति उनके जुड़ाव को प्रकट करता है।

शिव का हरा रंग मुख्य रूप से उनकी मरकणेश्वर या मरकत लिंग (पन्ने से बना शिवलिंग) के रूप में पूजा से जुड़ा है। दक्षिण भारत के कई प्राचीन मंदिरों में पन्ने के शिवलिंग स्थापित हैं, जहाँ शिव की आराधना समृद्धि, हीलिंग और जीवन की ऊर्जा के लिए की जाती है। ज्योतिष शास्त्र में भी हरा रंग बुध ग्रह का प्रतीक है, और माना जाता है कि शिव के इस स्वरूप की पूजा करने से बुद्धि और वाणी में वास करने वाले दोष दूर होते हैं।

इसके अलावा, भगवान शिव का एक नाम प्रकृतिपति भी है। हरा रंग सृजन, हरियाली और जीवन का प्रतीक है। शिव जब माता पार्वती (जो स्वयं प्रकृति स्वरूपा हैं) के साथ अर्धनारीश्वर रूप में होते हैं, तब भी प्रकृति के इस हरे और जीवंत पहलू को दर्शाया जाता है। विषपान करने वाले नीलकंठ महादेव जहाँ एक ओर संहारक हैं, वहीं दूसरी ओर वे समस्त सृष्टि को जीवन देने वाले परम कल्याणकारी देव भी हैं। इसलिए, उन्हें हरे रंग में देखना उनके इसी जीवनदायी और प्रकृति-रक्षक रूप का सम्मान करना है।

यह भी देखें

विस्तृत लेख

संबंधित विषय