भगवान से क्या मांगें?

कई बार हम प्रार्थना करते हैं, मन में बड़ी-बड़ी इच्छाएँ लेकर। धन, स्वास्थ्य, सफलता—हर चाहत के साथ भगवान के द्वार पर दस्तक देते हैं। लेकिन क्या सच में भगवान से कुछ मांगना चाहिए?

एक सच्चे भक्त की भावना अलग होती है। वह नहीं कहता, "हे प्रभु, यह दे दो," बल्कि कहता है, "हे प्रभु, मेरी वह इच्छा ही मिटा दो जो तुमसे दूर कर दे।" असली भक्ति में माँगने की नहीं, छोड़ देने की भावना होती है।

“हे प्रभु, मैं यह माँगता हूँ कि मेरी माँगने की इच्छा ही खत्म हो जाए,”—यह वाणी तो आत्मा की गहराई से निकली है। जब इंसान को एहसास हो जाता है कि भगवान से दूरी नहीं, बल्कि निकटता चाहिए, तो वह नहीं माँगता, बस स्मरण करता है।

कुछ संतों ने तो यहाँ तक कहा है—“हे प्रभु, मुझे विपत्ति दो, ताकि तेरा स्मरण न छूटे।” क्योंकि सुख में भगवान भूल जाते हैं, लेकिन कष्ट में वह याद आते हैं।

और फिर एक अनूठी प्रार्थना—“हे प्रभु, मुझे दस हज़ार कान दो, ताकि मैं

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