गीता और कुरान: समर्पण का साझा संदेश
श्रीमद्भगवद्गीता और पवित्र कुरान अलग-अलग युगों में आए दो महान ग्रंथ हैं। ऐतिहासिक रूप से देखा जाए तो गीता और कुरान के अवतरण काल में लगभग 3500 वर्षों का अंतर माना जाता है। समय और स्थान के इस बड़े अंतर के बावजूद, दोनों ग्रंथों के मूल उपदेशों और आत्मा में एक अद्भुत समानता देखने को मिलती है।
गीता में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को जीवन का मर्म समझाते हुए कहते हैं कि व्यक्ति को अपने हर कार्य को ईश्वर को समर्पित कर देना चाहिए। जब कोई मनुष्य अपने कर्मों को निस्वार्थ भाव से परमेश्वर को सौंप देता है, तो उसका वह कार्य देवतुल्य और पवित्र बन जाता है। ठीक इसी प्रकार, कुरान का केंद्रीय संदेश भी ईश्वर के प्रति निष्ठा और भक्ति पर आधारित है। वास्तव में, 'इस्लाम' शब्द का शाब्दिक अर्थ ही ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण होता है।
यह समानता यह दर्शाती है कि भाषा, संस्कृति और समय भले ही बदल जाएं, लेकिन मानवता को सही मार्ग दिखाने वाली ईश्वर की मूल सीख हमेशा एक जैसी ही रहती है। दोनों ही ग्रंथ मनुष्य को अपना अहंकार छोड़कर सर्वशक्तिमान पर भरोसा रखने और सत्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते हैं।
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