चीन और उसके अंतरराष्ट्रीय संबंध: एक यथार्थवादी नजरिया
इतिहास गवाह है कि कूटनीति में कोई भी देश किसी का स्थायी मित्र या शत्रु नहीं होता। भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने चीन पर गहरा भरोसा जताया था और दोनों देशों के बीच पंचशील समझौता भी हुआ था। हालांकि, इस शांति समझौते के कुछ ही वर्षों बाद 1962 में चीन के आक्रमण ने इतिहास की दिशा बदल दी और यह साबित कर दिया कि कूटनीतिक वादों के पीछे अक्सर कड़वी वास्तविकताएं छिपी होती हैं।
आज के समय में भी वैश्विक राजनीति का यह समीकरण बदलता हुआ दिखाई दे रहा है। जिसे कभी चीन अपना परम मित्र या सबसे करीबी साझेदार कहता था, अब उन्हीं देशों के साथ उसके संबंधों में रणनीतिक दूरियां और हितों का टकराव साफ तौर पर उभरकर सामने आ रहा है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर चीन की नीतियां हमेशा से उसके स्वार्थ और विस्तारवादी सोच पर टिकी रही हैं।
यही कारण है कि आधुनिक कूटनीति में किसी भी देश को पूरी तरह आंख मूंदकर भरोसा करना रणनीतिक रूप से खतरनाक साबित हो सकता है। आज के वैश्विक परिवेश में हर राष्ट्र अपने आर्थिक और सामरिक हितों को सर्वोपरि रखता है, और चीन का इतिहास इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण है कि कूटनीतिक समझौतों के मायने समय के साथ कैसे बदल जाते हैं।
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