जैव प्रौद्योगिकी के मुख्य सिद्धांत

जैव प्रौद्योगिकी (Biotechnology) आधुनिक विज्ञान का एक ऐसा क्षेत्र है जो जीव विज्ञान और तकनीक को जोड़कर मानव कल्याण के लिए नए समाधान तैयार करता है। इसका मुख्य उद्देश्य जीवित जीवों, कोशिकाओं और उनके घटकों का उपयोग करके उपयोगी उत्पाद बनाना है। आधुनिक जैव प्रौद्योगिकी मुख्य रूप से दो बड़े सिद्धांतों पर टिकी हुई है:

1. आनुवंशिक अभियांत्रिकी (Genetic Engineering): इस सिद्धांत के अंतर्गत जीवों के आनुवंशिक पदार्थ जैसे DNA या RNA की संरचना में बदलाव किया जाता है। जब किसी जीव के आनुवंशिक कोड में सुधार या परिवर्तन किया जाता है, तो उसके गुणों में मनचाहा बदलाव लाया जा सकता है। इसी तकनीक की मदद से कीट-प्रतिरोधी फसलें, बेहतर दवाएं और आनुवंशिक बीमारियों के इलाज संभव हो पा रहे हैं।

2. रासायनिक एवं जैविक प्रक्रम अभियांत्रिकी (Bioprocess Engineering): इस सिद्धांत का ध्यान वांछित सूक्ष्मजीवों या कोशिकाओं को बड़े पैमाने पर उगाने के लिए अनुकूल वातावरण देने पर होता me। इसके तहत पूर्णतः रोगाणुरहित (Sterile) और नियंत्रित माहौल तैयार किया जाता है, ताकि केवल वही उपयोगी जीवाणु या कोशिकाएं बढ़ सकें जिनकी जरूरत है। इसी प्रक्रिया के जरिए एंटीबायोटिक्स, टीके (Vaccines) और एंजाइम का औद्योगिक स्तर पर निर्माण किया जाता है।

संक्षेप में कहें तो, आनुवंशिक स्तर पर बदलाव करना और फिर नियंत्रित वातावरण में उनका बड़े पैमाने पर उत्पादन करना ही जैव प्रौद्योगिकी का मूल आधार है।

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