भारत में अंग्रेजों का आगमन: व्यापार से साम्राज्य तक का सफर

भारतीय इतिहास में 17वीं शताब्दी की शुरुआत एक ऐसा मोड़ थी, जिसने आने वाले सदियों के लिए देश की तकदीर बदल दी। 1608 ईस्वी में कैप्टन विलियम हॉकिन्स के नेतृत्व में 'हेक्टर' नामक जहाज सूरत के तट पर पहुंचा था। यह भारत की धरती पर किसी अंग्रेज का पहला आधिकारिक कदम था।

भारत में आने वाले ये पहले अंग्रेज कोई सैनिक या राजा नहीं, बल्कि ईस्ट इंडिया कंपनी के व्यापारी थे। सन् 1600 में महारानी एलिजाबेथ प्रथम से व्यापारिक एकाधिकार प्राप्त करने के बाद, इस कंपनी का मुख्य उद्देश्य भारतीय मसालों, सूती कपड़ों और रेशम का व्यापार करना था। उस समय भारत अपनी समृद्धि और वैभव के लिए पूरी दुनिया में प्रसिद्ध था, जिसे देखकर ब्रिटिश व्यापारी यहां खिंचे चले आए।

शुरुआत में, इन व्यापारियों ने तत्कालीन मुगल बादशाह जहांगीर के दरबार में हाजिरी लगाई और भारत में व्यापारिक कोठियां स्थापित करने की अनुमति मांगी। अंग्रेजों से पहले पुर्तगाली और डच व्यापारी पहले से ही भारत में सक्रिय थे, लेकिन ब्रिटिशर्स ने अपनी कूटनीति और रणनीतिक सूझबूझ से धीरे-धीरे सबको पीछे छोड़ दिया।

जो सिलसिला महज मुनाफा कमाने और व्यापार करने के इरादे से शुरू हुआ था, उसने धीरे-धीरे भारतीय राजनीति की कमजोरियों का फायदा उठाना शुरू कर दिया। समय के साथ, इन व्यापारियों की महत्वाकांक्षाएं बढ़ती गईं और उन्होंने व्यापारिक चौकियों की सुरक्षा के नाम पर अपनी सेनाएं रखनी शुरू कर दीं। इस तरह, व्यापार के तराजू को हाथ में लेकर आए अंग्रेजों ने धीरे-धीरे भारत की सत्ता की बागडोर अपने हाथों में ले ली और अगले दो सौ सालों तक भारत पर राज किया।

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