भारतीय संगीत में सप्तक और उनके तीन रूप
भारतीय शास्त्रीय संगीत में सप्तक का विशेष महत्व है। सात शुद्ध स्वरों (सा, रे, ग, म, प, ध, नि) के समूह को सप्तक कहा जाता है। जब कोई गायक या वादक संगीत साधना करता है, तो वह अपनी आवाज़ या वाद्य यंत्र की ध्वनि की गहराई और ऊँचाई को व्यक्त करने के लिए अलग-अलग सप्तकों का प्रयोग करता है।
गायन और वादन की व्यावहारिक सीमा मुख्य रूप से तीन सप्तकों तक मानी गई है। इन तीनों सप्तकों के नाम मन्द्र सप्तक, मध्य सप्तक और तार सप्तक हैं।
मन्द्र सप्तक में ध्वनि बहुत ही गंभीर, भारी और नीची होती है। इसका अभ्यास सीने (हृदय) से बल लगाकर किया जाता है। जब संगीतकार सामान्य आवाज़ से नीचे के स्वरों को गाते हैं, तो वे मन्द्र सप्तक का उपयोग करते हैं।
मध्य सप्तक हमारे गाने और बजाने का मुख्य आधार होता है। इसे हम अपनी सामान्य और स्वाभाविक आवाज़ में गाते हैं। संगीत की अधिकांश रचनाएँ और बंदिशें इसी सप्तक में रची और गाई जाती हैं।
तार सप्तक ऊँचे सुरों का क्षेत्र है। जब गायक को अपनी आवाज़ को ऊँचाई पर ले जाना होता है, तो वह तार सप्तक का सहारा लेता है। इसका उच्चारण मुख्य रूप से मस्तिष्क और गले के ऊपरी हिस्से के दबाव से होता है।
इन तीनों सप्तकों का संतुलन ही शास्त्रीय संगीत में सुंदरता और रस पैदा करता है। सही सप्तक का चयन करके ही एक कलाकार अपनी प्रस्तुति को प्रभावशाली बना पाता है।
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