दिल्ली का ऐतिहासिक सफर: इंद्रप्रस्थ से आधुनिक राजधानी तक

दिल्ली सिर्फ भारत की राजधानी नहीं है, बल्कि यह सदियों पुराने इतिहास, संस्कृति और कई सभ्यताओं का जीता-जागता गवाह है। अक्सर लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि दिल्ली पहले क्या थी? अगर हम इतिहास के पन्नों को पलटें, तो दिल्ली का इतिहास पौराणिक काल से जुड़ा हुआ है।

महाभारत काल में इस क्षेत्र को इंद्रप्रस्थ के नाम से जाना जाता था, जो पांडवों की गौरवशाली राजधानी थी। ऐसा माना जाता है कि आज का पुराना किला उसी इंद्रप्रस्थ के स्थान पर स्थित है। वक्त बदला और मध्यकाल में तोमर वंश के राजा अनंगपाल ने 11वीं शताब्दी में 'ढिल्लिका' शहर की स्थापना की, जिससे आगे चलकर इसका नाम 'दिल्ली' पड़ा।

दिल्ली की रणनीतिक स्थिति और भौगोलिक महत्व के कारण यह हमेशा से राजाओं और राजाओं के आकर्षण का केंद्र रही। पृथ्वीराज चौहान से लेकर दिल्ली सल्तनत, खिलजी, तुगलक, लोदी और फिर मुगलों ने इस पर राज किया। मुगलों के समय शाहजहाँनाबाद (जिसे आज हम पुरानी दिल्ली कहते हैं) कला और संस्कृति का मुख्य केंद्र बनी। लाल किला, जामा मस्जिद और चाँदनी चौक उसी दौर की खूबसूरत निशानियाँ हैं।

1911 में अंग्रेजों ने कलकत्ता (अब कोलकाता) की जगह दिल्ली को ब्रिटिश भारत की नई राजधानी घोषित किया और एडविन लुटियंस तथा हरबर्ट बेकर ने मिलकर नई दिल्ली की रूपरेखा तैयार की। आज की दिल्ली अपने इसी समृद्ध और उतार-चढ़ाव भरे अतीत को समेटे हुए एक वैश्विक महानगर के रूप में खड़ी है, जहाँ प्राचीन विरासत और आधुनिकता का एक अनोखा संगम देखने को मिलता है।

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