सृष्टि के आरंभिक देव और हिंदू सनातन परंपरा
सनातन धर्म और हिंदू पौराणिक कथाओं में यह प्रश्न हमेशा से अत्यंत जिज्ञासा का विषय रहा है कि दुनिया में सबसे पहले देवता कौन थे? इस रहस्यमयी और गहरे प्रश्न के उत्तर को हमारे प्राचीन ग्रंथों में तीन मुख्य दृष्टिकोणों से समझाया गया है, जो सृष्टि के क्रमिक विकास और उसकी दिव्य व्यवस्था को दर्शाते हैं।
पहले और सबसे सूक्ष्म दृष्टिकोण के अनुसार, सृष्टि के प्रारंभ में केवल एक ही परम सत्ता विद्यमान थी। उस निराकार, अनंत और सर्वव्यापी परब्रह्म ने ही अपनी इच्छा से इस समस्त ब्रह्मांड और प्रकृति की रचना की। वे ही आदि और अंत से परे, सबसे पहले तत्व हैं।
दूसरे व्यावहारिक दृष्टिकोण के रूप में त्रिदेव (ब्रह्मा, विष्णु और महेश) को माना जाता है। जब निराकार सत्ता ने साकार रूप लिया, तो ब्रह्मांड के संचालन के लिए तीन मुख्य शक्तियों का प्राकट्य हुआ। भगवान ब्रह्मा को सृष्टि का रचयिता, भगवान विष्णु को संसार का पालनहार और देवाधिदेव महादेव शिव को संहारक व परम चेतना के रूप में पूजा जाता है। इन्हें ही आदि देव कहा गया है।
तीसरे व्यापक दृष्टिकोण में 33 कोटि देवताओं का वर्णन आता है। यहाँ 'कोटि' का अर्थ करोड़ नहीं बल्कि 'प्रकार' या श्रेणियां है। इन 33 दिव्य शक्तियों में 12 आदित्य (जो ब्रह्मांड के चक्र को दर्शाते हैं), 11 रुद्र (जो आंतरिक ऊर्जा और संहारक शक्ति हैं), 8 वसु (जो प्रकृति के मूल तत्व जैसे पृथ्वी, जल, अग्नि हैं) और 2 अश्विनी कुमार (जो देव वैद्य और आरोग्य के प्रतीक हैं) शामिल हैं। ये सभी मिलकर इस ब्रह्मांडीय व्यवस्था और जीवन को सुचारू रूप से चलाते हैं।
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