दोपहर के सुर: राग गौड़ सारंग और मुल्तानी
भारतीय शास्त्रीय संगीत में समय चक्र का बहुत गहरा महत्व है। हर प्रहर का अपना एक अलग मिजाज और उससे जुड़ा राग होता है, जो उस समय के वातावरण और मन की भावनाओं को सीधे प्रभावित करता है। दोपहर के समय गाए जाने वाले रागों में राग गौड़ सारंग और राग मुल्तानी का स्थान बेहद खास माना जाता है।
दिन का दूसरा प्रहर, यानी दोपहर का समय, अक्सर थकान और शांति का मिश्रण होता है। ऐसे माहौल में राग गौड़ सारंग मन को एक अनोखा सुकून देता है। यह राग कल्याण थाट से उत्पन्न हुआ है। इसकी बनावट में जो मिठास और ठहराव है, वह दोपहर की चढ़ती धूप में भी संगीत प्रेमी के दिल में शांति भर देता है। इसमें निषाद और तीव्र मध्यम का प्रयोग संगीत में एक ख़ास रंग जोड़ता है।
वहीं दूसरी ओर, जैसे-जैसे दोपहर ढलने लगती है और तीसरे प्रहर की शुरुआत होती है, राग मुल्तानी का प्रभाव बढ़ने लगता है। यह राग टोडी थाट का एक बेहद गंभीर और करुण रस से भरा राग है। दोपहर के अंत में जब सूरज ढलने की ओर होता है, तब मुल्तानी के सुर वातावरण में एक ठहराव और उदासी भरा लेकिन बेहद खूबसूरत एहसास पैदा करते हैं।
इन दोनों रागों की अपनी अलग-अलग तासीर है। जहाँ गौड़ सारंग में एक तरह का आनंद और भक्ति भाव है, वहीं मुल्तानी में गहराई और आत्म-चिंतन का अहसास होता है। यही शास्त्रीय संगीत की खूबसूरती है कि यह समय के साथ बदलकर हमारे मन को सही दिशा देता है।
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