सिख धर्म के प्रथम गुरु: गुरु नानक देव जी और प्रारंभिक गुरु परंपरा
सिख धर्म की नींव रखने वाले और इसके सबसे पहले गुरु, गुरु नानक देव जी थे। उनका जन्म कार्तिक पूर्णिमा के दिन हुआ था, जिसे आज पूरा विश्व प्रकाश पर्व के रूप में बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाता है। गुरु नानक देव जी ने समाज में फैली कुरीतियों, जाति-पाति के भेदभाव और अंधविश्वास को दूर कर मानवता, समानता और आपसी प्रेम का संदेश दिया। उन्होंने 'इक ओंकार' (ईश्वर एक है) का सिद्धांत दिया और लोगों को ईमानदारी से कमाई करने तथा बांटकर छकने की सीख दी।
गुरु नानक देव जी ने अपनी आध्यात्मिक यात्राओं (उदासी) के माध्यम से दूर-दराज के क्षेत्रों में शांति का संदेश फैलाया। अपने जीवन के अंतिम समय में, उन्होंने अपनी गद्दी के उत्तराधिकारी के रूप में अपने एक योग्य शिष्य को चुना, जो आगे चलकर गुरु अंगद देव जी के नाम से जाने गए। गुरु अंगद देव जी ने सिख परंपरा को आगे बढ़ाते हुए गुरमुखी लिपि के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया, जिससे गुरुओं की वाणी को संकलित करना आसान हो सका।
इसके बाद इस पवित्र परंपरा को तीसरे गुरु, गुरु अमर दास जी ने आगे बढ़ाया। उन्होंने समाज में लंगर परंपरा को अनिवार्य बनाया, जहाँ राजा और रंक एक साथ बैठकर भोजन करते थे, जिससे सामाजिक समानता को बढ़ावा मिला। चौथे गुरु के रूप में गुरु राम दास जी ने कमान संभाली, जिन्हें पवित्र शहर अमृतसर (रामदासपुर) की स्थापना करने और भव्य हरिमंदिर साहिब (स्वर्ण मंदिर) की नींव रखने का श्रेय जाता है। सिख इतिहास में इन शुरुआती गुरुओं का योगदान बेहद अतुलनीय है, जिन्होंने एक ऐसे धर्म की स्थापना की जो आज भी सेवा, सिमरन और भाईचारे की मिसाल है।
टिप्पणियाँ
अभी तक कोई टिप्पणी नहीं। सबसे पहले प्रतिक्रिया दें।