भगवान शिव और श्री हरि विष्णु की उत्पत्ति की पौराणिक गाथा
सनातन धर्म में भगवान शिव और भगवान विष्णु का स्थान सर्वोच्च माना गया है। त्रिदेवों में शिव जी को संहारक और विष्णु जी को सृष्टि का पालनकर्ता कहा जाता है। अक्सर लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि इन देवों का जन्म कैसे हुआ। पौराणिक मान्यताओं और ग्रंथों में इसके पीछे अत्यंत दिव्य कथाएं बताई गई हैं।
शिव पुराण के अनुसार, भगवान शिव स्वयंभू हैं, यानी वे अनादि हैं और उनका न कोई आरंभ है और न ही अंत। इस पुराण की एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार, एक बार भगवान शिव ने माता पार्वती से एक ऐसे पुरुष की रचना करने की बात कही, जो समस्त ब्रह्मांड के संचालन और पालन-पोषण का भार संभाल सके। इसके बाद भगवान शिव और भगवती शक्ति के तेजोमय प्रताप से श्री हरि विष्णु का प्रादुर्भाव हुआ। प्रकट होते ही विष्णु जी का स्वरूप अत्यंत दिव्य, अलौकिक और अद्वितीय था।
हालांकि, विभिन्न पुराणों में कथा का वर्णन अलग-अलग दृष्टिकोण से मिलता है। जैसे कि विष्णु पुराण में उल्लेख आता है कि भगवान विष्णु के नाभिकमल से ब्रह्मा जी का जन्म हुआ और ब्रह्मा जी की भ्रुकुटी (माथे) से रुद्र रूप में शिव जी प्रकट हुए।
वास्तव में, सनातन दर्शन यह सिखाता है कि शिव और विष्णु दो अलग-अलग सत्ताएं नहीं, बल्कि एक ही परमब्रह्म के दो रूप हैं। एक ओर जहाँ शिव जी वैराग्य और चेतना का प्रतीक हैं, वहीं विष्णु जी धर्म, सत्य और संपूर्ण सृष्टि के संतुलन को बनाए रखते हैं।
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