भगवान हमारी कब सुनता है?
कई बार जीवन में ऐसे पल आते हैं जब हम सब कुछ खो बैठते हैं—सामर्थ्य, आशा, यहाँ तक कि आत्मविश्वास भी। ऐसे पलों में एक गहरी पुकार उठती है, जो शब्दों से परे होती है। यही प्रार्थना है।
भगवान हमारी प्रार्थना तब सुनता है जब हम या तो पूरी तरह कृतज्ञ होते हैं या फिर पूरी तरह निराश और निर्बल। कृतज्ञता के पल में हमारा हृदय इतना भर जाता है कि शब्द नहीं, आत्मा बोलती है। वहीं, निराशा के शिखर पर हम इतने निःसहाय हो जाते हैं कि खुद पर भरोसा टूट जाता है और फिर वही पल भगवान तक पहुँचने का बन जाता है।
प्रार्थना कोई रस्म नहीं है, न ही यह शब्दों की फ़ेहरिस्त है। यह एक अवस्था है—एक ऐसी अवस्था जहाँ आप अपने अहंकार को छोड़ देते हैं। जब आप न तो अपनी ताकत पर भरोसा कर पाते हैं और न ही भविष्य पर, तब आपकी आत्मा एक सूक्ष्म ध्वनि में भगवान की ओर मुड़ती है।
यही वह पल होता है जब आपकी प्रार्थना सच में सुनी जाती है। न क्योंकि आपने
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