भारत के सरकारी कर्ज की स्थिति और विश्व बैंक की सच्चाई

हाल के दिनों में सोशल मीडिया पर एक सवाल काफी चर्चा में रहा है कि भारत में सबसे ज्यादा कर्ज किस प्रधानमंत्री के कार्यकाल में लिया गया है। इस दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नाम से कई दावे किए गए और इसे विश्व बैंक (World Bank) की आधिकारिक रिपोर्ट से जोड़कर पेश किया गया। हालांकि, जब आर्थिक आंकड़ों और रिपोर्ट्स की पड़ताल की जाती है, तो स्थिति थोड़ी अधिक स्पष्ट और व्यावहारिक नजर आती है।

अर्थशास्त्रियों के अनुसार, किसी देश का कुल कर्ज समय के साथ अर्थव्यवस्था के आकार (GDP) के साथ बढ़ता है। भारत जैसी बढ़ती अर्थव्यवस्था के लिए अवसंरचना, स्वास्थ्य, शिक्षा और अन्य विकास परियोजनाओं के लिए विदेशी और आंतरिक कर्ज लेना एक सामान्य वित्तीय प्रक्रिया है। विश्व बैंक और वित्त मंत्रालय के आंकड़े यह दर्शाते हैं कि भारत ने समय-समय पर विश्व बैंक, एशियाई विकास बैंक (ADB) और अन्य वैश्विक संस्थानों से विकास परियोजनाओं के लिए ऋण लिया है।

आंकड़ों के संदर्भ में ध्यान देने योग्य बात यह है कि देश का कुल सार्वजनिक ऋण (Public Debt) केवल विदेशी कर्जों तक सीमित नहीं होता, बल्कि इसमें आंतरिक बॉन्ड और सरकारी प्रतिभूतियां भी शामिल होती हैं। विश्व बैंक की आधिकारिक वेबसाइट पर मौजूद आंकड़े किसी एक कार्यकाल को नकारात्मक रूप से दर्शाने के लिए नहीं, बल्कि विभिन्न वर्षों की वित्तीय प्रगति और विकास सहायता को ट्रैक करने के लिए बनाए गए हैं। इसलिए, किसी भी दावे को केवल राजनीतिक बयानबाजी के बजाय आधिकारिक आंकड़ों के आधार पर समझना ही सही दृष्टिकोण है।

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