मनुष्य कैसे भगवान बन सकता है?
हम सभी मनुष्य हैं, लेकिन कुछ ही लोग मनुष्यता से आगे बढ़कर दिव्यता को प्राप्त कर पाते हैं। वेदों के अनुसार, आत्मा की यात्रा नीचे से ऊपर की ओर होती है। वह पहले जड़ में रहती है, फिर प्राण में, उसके बाद मन में और फिर विवेक में प्रवेश करती है। जो व्यक्ति मन के भावों, इच्छाओं और विचारों में फंस जाता है, वह आगे नहीं बढ़ पाता।
सच्चा उदय तब होता है जब मन से ऊपर विवेक और आनंद के स्तर पर पहुँचा जाता है।यही वह स्थिति है जहाँ मनुष्य देवत्व को छूने लगता है। जब व्यक्ति अपने मन की बुद्धि से आगे बढ़कर अति-मन, यानी अंतर्ज्ञान और आत्म-साक्षात्कार की अवस्था में पहुँचता है, तो वह भगवान के स्वरूप को महसूस करने लगता है।
इस यात्रा में तप, साधना, सच्चे उद्देश्य और आत्म-जागरूकता की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। कोई व्यक्ति भौतिक सुखों में लिप्त रहकर इस स्तर तक नहीं पहुँच सकता। जैसे नदी समुद्र बनने के लिए बहती है, वैसे ही आ
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