मम्मी की सवारी में पीछे बैठना – यादों का सफर
“मम्मी की सवारी पर पीछे जाते हो क्या?” – ये सवाल सुनते ही दिल में एक अजीब-सा झरना छलक उठता है। कौन नहीं जानता उस छोटी-सी साइकिल पर पीछे बैठे हमें मम्मी स्कूल, मेले या दादी के घर तक ले जाती थीं? हवा में उड़ते बाल, बंपर से टकराते पैर, और पीछे से लिपटी हथेलियाँ… बस, ऐसे पल थे जब सुरक्षा का मतलब था – मम्मी की पीठ।
पीछे बैठना सिर्फ सवारी नहीं, एक भावना थी। वो दौर जब एंग्जाइटी नहीं, सिर्फ उत्सुकता होती थी। क्या पता, अगले कोने पर पानीपुरी वाला मिल जाए! मम्मी की तेज धपकती साइकिल, बचपन की आवाज में चिल्लाया गया "ऊपर उड़ रहा हूँ!" – ये सब आज भी याद आए तो आँखें नम हो जाती हैं।आज के समय में, जब बच्चे कार में बच्चे की सीट पर बैठते हैं, तो उस पुराने जमाने की सादगी और प्यार अलग ही लगता है। कोई ऑटो नहीं, कोई नौकरी वाली टू-व्हीलर नहीं – बस माँ की मेहनत और प्यार की धड़कन।
आज भी कई माँएँ ऐसा करती हैं – छोटे ब
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