राग भैरवी: भारतीय संगीत का एक अनमोल रत्न

भारतीय शास्त्रीय संगीत में राग भैरवी का एक अत्यंत विशेष और महत्वपूर्ण स्थान है। पारंपरिक संगीत नियमों के अनुसार, इस राग के गायन और वादन का मुख्य समय प्रातःकाल यानी भोर का समय माना गया है। सुबह की शांत वेला में इसके कोमल स्वरों का गूंजन मन को असीम शांति, भक्ति और अध्यात्म का अनुभव कराता है।

राग के वादी-संवादी स्वरों को लेकर संगीत विद्वानों में थोड़ा मतभेद भी देखने को मिलता है। कुछ संगीतज्ञ इसमें 'पंचम' (प) और 'षड्ज' (सा) को वादी-संवादी स्वीकार करते हैं, किंतु अधिकांश आचार्यों का स्पष्ट मत है कि इसमें मध्यम (म) वादी और षड्ज (सा) संवादी स्वर हैं। भैरवी थाट के इस राग में सभी चार स्वर—ऋषभ, गंधार, धैवत और निषाद—कोमल प्रयोग किए जाते हैं।

यद्यपि इसका शास्त्रीय समय सुबह का है, लेकिन इसकी अद्भुत मधुरता, कणप्रियता और भावपूर्ण प्रकृति के कारण इसे सर्वकालिक राग भी माना जाता है। यही वजह है कि शास्त्रीय संगीत की महफिलों, संगीत सभाओं और कार्यक्रमों का समापन प्रायः राग भैरवी की प्रस्तुति से ही करने की समृद्ध परंपरा रही है। ठुमरी, दादरा, गज़ल और भजनों में भी इस राग का सौंदर्य देखते ही बनता है।

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