जबलपुर जाते हुए एक अनोखा सफर
एक गर्म दोपहर थी। लेखक और उसके दो मित्र पन्ना में थे, जहाँ वे किसी काम से आए थे। काम खत्म होने के बाद उन्हें शाम तक जबलपुर जाना था। बस स्टैंड पर पहुँचे तो देखा कि शाम की बस बिल्कुल जर्जर हालत में थी। कंक्रीट से भरे टायर, टूटी खिड़कियाँ और छत पर बैठे यात्री—सब कुछ खतरे की ओर इशारा कर रहा था।
“ये बस कहीं चलेगी भी?” — एक मित्र ने मुस्कुराते हुए कहा। लेकिन मजाक में भी एक सच था। रास्ते की हालत खराब थी, बस का इंजन टूट-टूटकर चीख रहा था। फिर भी, यात्री उतरे नहीं। क्योंकि अगली बस तीन घंटे बाद थी।
लेखक ने खिड़की से बाहर झांका — नारसिंहगढ़ के पास का नजारा खूबसूरत था। खेतों में चावल की हरियाली, दूर पहाड़ियाँ और एक छोटी नदी धूप में चमक रही थी। उस पल उस जर्जर बस में भी कुछ जादू सा था।
जैसे-जैसे बस जबलपुर की ओर बढ़ी, रास्ते में कई छोटे गाँव और टीले गुजरते गए। कुछ यात्री गाने गुनगुनाने लगे। एक ब
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