खिलौनेवाले का आगमन
बचपन के उन सरल दिनों में खिलौनेवाले का आना एक त्योहार जैसा होता था। जैसे ही वह पुरानी साइकिल पर बेलन बजाते हुए गली में दिखाई देता, सभी बच्चों की निगाहें उसकी तरफ़ चिपक जाती थीं। उसकी थैली में रंग-बिरंगे खिलौने – चमकीले गुब्बारे, लकड़ी के घोड़े, प्लास्टिक की गुड़ियाँ और झनझनाते घुंघरू – सब कुछ बच्चों को अपनी ओर खींच लेते थे।
खिलौनेवाले के आने पर बच्चों की आँखों में चमक आ जाती थी।एक के बाद एक सभी दौड़कर आते और उसे घेर लेते। कोई पैसे लेकर खिलौना माँगता, तो कोई बेलन बजाने की नकल करके सबको हँसाता। छोटे-छोटे हाथों में नया खिलौना आते ही उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहता। वे उछलते, कूदते और आसपास के बच्चों को दिखाते – जैसे कोई बहुमूल्य खजाना मिल गया हो।
आज बाज़ार में खिलौनों की बहार है, लेकिन उस सादे खिलौनेवाले के आने का जादू अब शायद ही कहीं देखने को मिले। वह न सिर्फ़ खिलौने बेचता था, बल्क
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