वेदों को 'श्रुति' क्यों कहा जाता है?

प्राचीन भारत में ज्ञान और परंपरा का प्रवाह मुख्य रूप से मौखिक माध्यम से ही होता था। भारतीय संस्कृति के सबसे पवित्र और मूल ग्रंथ वेदों को श्रुति कहा जाता है, जिसके पीछे एक बहुत ही गहरा और सांस्कृतिक कारण छिपा है।

संस्कृत भाषा में 'श्रुति' शब्द का शाब्दिक अर्थ होता है — 'जो सुना गया हो'। प्राचीन समय में जब कागज या लेखन की तकनीक उपलब्ध नहीं थी, तब ज्ञान को भावी पीढ़ियों तक पहुँचाने का एकमात्र जरिया सुनना और याद रखना ही था। महान ऋषियों ने ध्यान और तपस्या के माध्यम से वेदों का ज्ञान प्राप्त किया। इसके बाद उन्होंने इस अमूल्य निधि को अपने शिष्यों और अन्य मनुष्यों को मौखिक रूप से प्रदान किया।

तभी से गुरु-शिष्य परंपरा की शुरुआत हुई। सदियों तक शिष्य गुरु के मुख से उच्चारित मंत्रों को ध्यानपूर्वक सुनते, उन्हें कंठस्थ करते और आगे अपनी अगली पीढ़ी को सिखाते थे। बहुत लंबे काल तक केवल श्रवण (सुनने) द्वारा ग्रहण किए जाने के कारण ही इन्हें 'श्रुति' नाम दिया गया। समय बीतने के साथ, जब लेखन कला का विकास हुआ, तब जाकर इन पवित्र मंत्रों को पुस्तकों के रूप में संकलित और संरक्षित किया गया।

वेदों में ज्ञान का अपार भंडार है। उदाहरण के लिए, सबसे प्राचीन वेद ऋग्वेद का मुख्य विषय पदार्थ ज्ञान और सृष्टि के मूल तत्वों की व्याख्या करना है। वेदों को श्रुति के रूप में संजोकर रखना हमारी उस महान प्राचीन ज्ञान परंपरा का प्रतीक है, जिसने मौखिक रूप में भी सदियों तक ज्ञान की शुद्धता को जीवित रखा।

यह भी देखें

विस्तृत लेख

संबंधित विषय