भारतीय संगीत और 'संगीत पितामह' पुरंदर दास
भारतीय शास्त्रीय संगीत की परंपरा अत्यंत प्राचीन और समृद्ध रही है। इस महान संगीत यात्रा में पुरंदर दास का नाम स्वर्णिम अक्षरों में अंकित है। उन्हें मुख्य रूप से दक्षिण भारतीय शास्त्रीय संगीत यानी कर्नाटक संगीत के पिता के रूप में सम्मानित किया जाता है। संगीत कला में उनके अतुलनीय और क्रांतिकारी योगदान के कारण ही उन्हें व्यापक रूप से 'संगीत पितामह' की उपाधि से नवाजा गया।
15वीं और 16वीं शताब्दी में विजयनगर साम्राज्य के समय जन्मे पुरंदर दास एक महान संत, कवि और संगीतकार थे। उन्होंने कर्नाटक संगीत को एक सुव्यवस्थित और वैज्ञानिक ढांचा प्रदान किया। संगीत शिक्षण को सुगम बनाने के लिए उन्होंने प्रारंभिक अभ्यासों और पाठों की रचना की। आज भी कर्नाटक संगीत सीखने वाला प्रत्येक विद्यार्थी उन्हीं के द्वारा निर्धारित की गई शिक्षण पद्धति का अनुसरण करता है।
पुरंदर दास जी ने हज़ारों भक्ति गीतों की रचना की, जिन्हें 'देवरानामा' कहा जाता है। कन्नड़ भाषा में लिखे गए उनके यह पद सरल, सुंदर और ज्ञानवर्धक हैं, जो आम जनमानस को भक्ति, नीति और नैतिकता का संदेश देते हैं। शास्त्रीय संगीत को जन-जन तक पहुँचाने और इसे अमर बनाने में उनका योगदान सदैव अविस्मरणीय रहेगा।
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